जगत गुरु कृपालु महाराज : भागवतम १.७.२३, २.५.१३, २.७.४७, १०.३७.२३ :
जैसे प्रकाश के आगे अन्धकार नहीं रह सकता, वैसे ही माया मेरे सामने नहीं खरही हो सकती । लेकिन, मेरी शक्ती के बिना वो नहीं खरही हो सकती ।
श्री कृष्ण की कृपा सब से सस्ती है । शरणागती । न अच्छा करो न बुरा करो । केवल मेरा स्मरण करो ।
जिस ग्रन्थ में श्री कृष्ण का वर्णन न हो, वो नहीं सुनना चाहिये । ऐसी कथा को बाँझ कहते हैं ।
१०.५१.३७, ११.११.१९-२०, १२.१२.४८
विशुद्ध सत्त्व का मेरा शरीर है ।
१०.२.२९ - ३४
सुरेश श्री माली जी :
शनी जयन्ती के दिन, २४/०५/०९ , -
"ॐ शम शानीयाय नमः" मंत्र का जप करते हुए, paarae kae shivling पे सरसों का तैल चर्हायें । उस तैल को पैर और हाथ पे लगायें ।
शनी प्रथम सौ दिन तो ज़रूर परेशान करेगा । जब तक आप शनी की अराधना नहीं करेंगे, तब तक कुछ नहीं होगा ।
शनी काल भैरव साधना ।
मन पर अनुशासन कर अंतर्मुखी होना चाहिये ।
नैतिकता, प्रमाणिकता, और नैतिक मूल्यों में आस्था होनी चाहिए ।
संयम की साधना, मन पे अनुशासन ।
Friday, May 22, 2009
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